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श्री दत्तात्रेय जी की आरती

त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती — संत एकनाथ

मूल पाठ

पवित्र पाठ मूल भाषा में ही दिया गया है।

त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती दत्त हा जाणा । त्रिगुणी अवतार त्रैलोक्यराणा । नेति नेति शब्द न ये अनुमाना । सुरवर मुनिजन योगी समाधी न ये ध्याना ॥ १ ॥ जय देव जय देव जय श्रीगुरुदत्ता । आरती ओवाळिता हरली भवचिंता ॥ धृ. ॥ सबाह्य अभ्यंतरी तू एक दत्त । अभाग्यासी कैची कळेल ही मात । पराही परतली तेथे कैचा हेत । जन्ममरणाचा पुरलासे अंत ॥ २ ॥ जय देव जय देव ॥ दत्त येऊनिया उभा ठाकला । सद्भावे साष्टांगे प्रणिपात केला । प्रसन्न होऊनी आशीर्वाद दिधला । जन्ममरणाचा फेरा चुकविला ॥ ३ ॥ जय देव जय देव ॥ दत्त दत्त ऐसे लागले ध्यान । हरपले मन झाले उन्मन । मीतूपणाची झाली बोळवण । एका जनार्दनी श्रीदत्तध्यान ॥ ४ ॥ जय देव जय देव ॥

अर्थ

संत एकनाथ की यह आरती गुरुवार, दत्त जयंती और दत्तात्रेय की हर पूजा में गाई जाती है।

१. ब्रह्मा, विष्णु और महेश — तीनों गुणों का एक रूप दत्त हैं, यह जानो। तीनों गुणों का यह अवतार तीनों लोकों का राजा है। "नेति नेति" कहने वाले वेद भी उनका अनुमान नहीं लगा पाते; देव, मुनि और योगी भी समाधि में उनका ध्यान नहीं कर पाते।

धृपद: हे श्रीगुरुदत्त, आपकी जय हो। आपकी आरती उतारते ही संसार की चिंता मिट गई।

२. बाहर और भीतर सब जगह आप ही एक दत्त हैं। यह बात अभागे को कैसे समझ आएगी? जहाँ परा वाणी भी लौट आती है, वहाँ कौन-सा हेतु बचेगा? (आपकी कृपा से) जन्म-मरण का अंत हो गया।

३. दत्त आकर सामने खड़े हो गए। मैंने सद्भाव से साष्टांग प्रणाम किया। उन्होंने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया और जन्म-मरण का चक्र छुड़ा दिया।

४. "दत्त दत्त" ऐसा ध्यान लग गया; मन खो गया और उन्मनी अवस्था आ गई। "मैं" और "तू" का भेद मिट गया। एकनाथ कहते हैं — गुरु जनार्दन की कृपा से श्रीदत्त का यह ध्यान लगा।

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