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संत ज्ञानेश्वर जी की आरती

आरती ज्ञानराजा — महाकैवल्यतेजा

मूल पाठ

पवित्र पाठ मूल भाषा में ही दिया गया है।

आरती ज्ञानराजा । महाकैवल्यतेजा । सेविती साधुसंत । मनु वेधला माझा ॥ धृ. ॥ लोपले ज्ञान जगी । हित नेणती कोणी । अवतार पांडुरंग । नाम ठेविले ज्ञानी ॥ १ ॥ आरती ज्ञानराजा ॥ कनकाचे ताट करी । उभ्या गोपिका नारी । नारद तुंबर हो । सामगायन करी ॥ २ ॥ आरती ज्ञानराजा ॥ प्रगट गुह्य बोले । विश्व ब्रह्मचि केले । रामजनार्दनी । पायी मस्तक ठेविले ॥ ३ ॥ आरती ज्ञानराजा ॥

अर्थ

संत ज्ञानेश्वर (माउली) की यह आरती आलंदी में, वारी में और ज्ञानेश्वर जयंती तथा संजीवन समाधि दिवस पर गाई जाती है।

धृपद: हे ज्ञानराज, मोक्ष के महान तेज से प्रकाशित माउली, आपकी आरती। साधु-संत आपकी सेवा करते हैं; मेरा मन आपकी ओर खिंच गया है।

१. संसार से सच्चा ज्ञान लुप्त हो गया था, किसी को अपना हित समझ नहीं आता था। तब स्वयं पांडुरंग ने अवतार लिया और उनका नाम "ज्ञानदेव" रखा।

२. सोने की थाली हाथ में लिए गोपियाँ (आरती के लिए) खड़ी हैं; नारद और तुंबरु सामवेद का गान कर रहे हैं।

३. ज्ञानेश्वर ने गूढ़ ज्ञान (ज्ञानेश्वरी द्वारा) सबके लिए प्रकट किया और सारे विश्व को ब्रह्मरूप दिखाया। रामजनार्दन कहते हैं — मैंने उनके चरणों में मस्तक रखा।

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