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श्री कृष्ण जी की आरती (मराठी)

ओवाळू आरती मदनगोपाळा — संत एकनाथ

मूल पाठ

पवित्र पाठ मूल भाषा में ही दिया गया है।

ओवाळू आरती मदनगोपाळा । श्यामसुंदर गळा वैजयंतीमाळा ॥ धृ. ॥ चरणकमळ ज्याचे अति सुकुमार । ध्वजवज्रांकुश ब्रीदाचा तोडर ॥ १ ॥ ओवाळू आरती ॥ नाभिकमळ ज्याचे ब्रह्मयाचे स्थान । हृदयी पदक शोभे श्रीवत्सलांछन ॥ २ ॥ ओवाळू आरती ॥ मुखकमळ पाहता सुखाचिया कोटी । वेधले मानस हारपली दृष्टी ॥ ३ ॥ ओवाळू आरती ॥ जडितमुगुट ज्याचा दैदीप्यमान । तेणे तेजे कोंदले अवघे त्रिभुवन ॥ ४ ॥ ओवाळू आरती ॥ एका जनार्दनी देखियले रूप । रूप पाहता झाले अवघे तद्रूप ॥ ५ ॥ ओवाळू आरती ॥

अर्थ

संत एकनाथ की यह मराठी आरती जन्माष्टमी पर और श्रीकृष्ण की पूजा में गाई जाती है।

धृपद: कामदेव-से सुंदर गोपाल की हम आरती उतारते हैं; उन श्यामसुंदर के गले में वैजयंती माला है।

१. जिनके चरणकमल अत्यंत कोमल हैं और जिन पर ध्वज, वज्र और अंकुश के शुभ चिह्न हैं; पैरों में भक्तों की रक्षा के व्रत का कड़ा है।

२. जिनकी नाभि के कमल में ब्रह्मा का स्थान है और हृदय पर श्रीवत्स चिह्न का पदक शोभा देता है।

३. उनका मुखकमल देखते ही करोड़ों सुख मिलते हैं; मन मुग्ध हो जाता है और दृष्टि खो जाती है।

४. उनका रत्नजड़ित मुकुट इतना तेजस्वी है कि उसकी आभा से पूरा त्रिभुवन भर गया है।

५. एकनाथ कहते हैं — गुरु जनार्दन की कृपा से मैंने यह रूप देखा, और देखते ही सब कुछ उसी में एकाकार हो गया।

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