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ऐकोनी कृष्णकीर्ती मन तेथें वेधलें

देवता: श्री कृष्ण

मूल पाठ

पवित्र पाठ मूल भाषा में ही दिया गया है।

ऐकोनी कृष्णकीर्ती मन तेथें वेधलें । सगुणरूप माये माझ्या जीवीं बैसलें । तें मज आवडतें अनुमान न बोले । पाहावया रूप याचें उतावीळ हो झालें ॥ १॥ यालागीं आरती हो कृष्णा पाही हो सखी । आणिक नावडे हो दुजे तिहीं हो लोकीं ॥ धृ॥ पाऊल कृष्णजीचें माझ्या जीवीं बैसलें । सनकादिक पाहा महा आसक्त झाले । मुक्त जो शुकमुनी तेणें मनीं धरिलें । तें मी केवीं सोडूं मज बहू रुचलें ॥ २॥ निर्गुण गोष्टि माये मज नावडे साचें । सगुण बोल कांहीं केव्हां आठवी वाचें । पाया लागेन तूझ्या हेंचि आर्त मनींचें । तेणें घडेल दास्य रमावल्लभाचें ॥ ३॥

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