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श्री महालक्ष्मी जी की आरती (मराठी)

जय देवी जय देवी जय महालक्ष्मी — मुक्तेश्वर

मूल पाठ

पवित्र पाठ मूल भाषा में ही दिया गया है।

जय देवी जय देवी जय महालक्ष्मी । वससी व्यापकरूपे तू स्थूलसूक्ष्मी ॥ धृ. ॥ करवीरपुरवासिनी सुरवरमुनिमाता । पुरहरवरदायिनी मुरहरप्रियकांता । कमलाकारे जठरी जन्मविला धाता । सहस्रवदनी भूधर न पुरे गुण गाता ॥ १ ॥ जय देवी जय देवी ॥ मातुलिंग गदा खेटक रविकिरणी । झळके हाटकवाटी पीयुषरसपाणी । माणिकरसना सुरंगवसना मृगनयनी । शशिकरवदना राजस मदनाची जननी ॥ २ ॥ जय देवी जय देवी ॥ तारा शक्ती अगम्या शिवभजका गौरी । सांख्य म्हणती प्रकृती निर्गुण निर्धारी । गायत्री निजबीजा निगमागम सारी । प्रगटे पद्मावती निजधर्माचारी ॥ ३ ॥ जय देवी जय देवी ॥ अमृतभरिते सरिते अघदुरिते वारी । मारी दुर्घट असुरा भवदुस्तर तारी । वारी मायापटल प्रणमत परिवारी । हे रूप चिद्रूप दावी निर्धारी ॥ ४ ॥ जय देवी जय देवी ॥ चतुराननें कुश्चित कर्मांच्या ओळी । लिहिल्या असतिल माते माझे निजभाळी । पुसोनि चरणातळी पदसुमने क्षाळी । मुक्तेश्वर नागर क्षीरसागरबाळी ॥ ५ ॥ जय देवी जय देवी ॥

अर्थ

कवि मुक्तेश्वर की यह मराठी आरती कोल्हापुर (करवीर) की महालक्ष्मी की है; दीवाली के लक्ष्मी-पूजन, शुक्रवार और नवरात्रि में यह गाई जाती है।

धृपद: हे महालक्ष्मी देवी, आपकी जय हो। स्थूल और सूक्ष्म सभी रूपों में आप सर्वत्र व्याप्त हैं।

१. करवीर (कोल्हापुर) नगरी में रहने वाली, देवों और मुनियों की माता, शंकर को भी वर देने वाली और विष्णु की प्रिय पत्नी। (विष्णु के) नाभि-कमल से ब्रह्मा जन्मे। हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी आपके गुण गाते-गाते पार नहीं पाते।

२. आपके हाथों में बिजौरा, गदा और ढाल हैं; आप सूर्य-किरणों जैसी तेजस्वी हैं; हाथ की सोने की कटोरी में अमृत चमकता है। माणिक की करधनी, सुंदर रंगीन वस्त्र, हिरनी जैसी आँखें और चंद्रमा जैसा मुख — आप कामदेव की माता हैं।

३. आप ही तारा, अगम्य शक्ति और शिवभक्तों की गौरी हैं। सांख्य दर्शन आपको निर्गुण प्रकृति कहता है। गायत्री का मूल बीज और वेद-शास्त्रों का सार आप ही हैं; धर्म का पालन करने वालों के लिए आप पद्मावती रूप में प्रकट होती हैं।

४. हे अमृत से भरी नदी-सी माता, पाप और दुःख दूर कीजिए। दुष्ट असुरों का नाश कीजिए और कठिन संसार से पार लगाइए। प्रणाम करने वाले भक्तों पर से माया का परदा हटाकर अपना चैतन्य रूप दिखाइए।

५. ब्रह्मा ने मेरे माथे पर बुरे कर्मों की रेखाएँ लिखी हों, तो हे माता, उन्हें अपने चरणों के नीचे मिटा दीजिए। हे क्षीरसागर की पुत्री, मुक्तेश्वर आपके चरण फूलों से धोते हैं।

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