अश्विन शुद्ध पक्षी अंबा बैसली सिंहासनी — घटस्थापना से दशहरा
मूल पाठ
पवित्र पाठ मूल भाषा में ही दिया गया है।
अश्विन शुद्ध पक्षी अंबा बैसली सिंहासनी हो ।
प्रतिपदेपासून घटस्थापना ती करुनी हो ।
मूलमंत्रजप करुनी भोवते रक्षक ठेवुनी हो ।
ब्रह्मा विष्णू रुद्र आईचे पूजन करिती हो ॥ १ ॥
उदो बोला उदो अंबाबाई माउलीचा हो ।
उदोकारे गर्जती काय महिमा वर्णू तिचा हो ॥ धृ. ॥
द्वितीयेचे दिवशी मिळती चौसष्ट योगिनी हो ।
सकळांमध्ये श्रेष्ठ परशुरामाची जननी हो ।
कस्तुरी मळवट भांगी शेंदूर भरुनी हो ।
उदोकारे गर्जती सकळ चामुंडा मिळुनी हो ॥ २ ॥
उदो बोला उदो ॥
तृतीयेचे दिवशी अंबे शृंगार मांडिला हो ।
मळवट पातळ चोळी कंठी हार मुक्ताफळा हो ।
कंठीची पदके कासे पीतांबर पिवळा हो ।
अष्टभुजा मिरविती अंबे सुंदर दिसे लीला हो ॥ ३ ॥
उदो बोला उदो ॥
चतुर्थीचे दिवशी विश्वव्यापक जननी हो ।
उपासका पाहसी अंबे प्रसन्न अंतःकरणी हो ।
पूर्णकृपे पाहसी जगन्माते मनमोहिनी हो ।
भक्तांच्या माउली सुर ते येती लोटांगणी हो ॥ ४ ॥
उदो बोला उदो ॥
पंचमीचे दिवशी व्रत ते उपांगललिता हो ।
अर्घ्य पाद्य पूजने तुजला भवानी स्तविती हो ।
रात्रीचे समयी करिती जागरण हरिकथा हो ।
आनंदे प्रेम ते आले सद्भावे क्रीडता हो ॥ ५ ॥
उदो बोला उदो ॥
षष्ठीचे दिवशी भक्ता आनंद वर्तला हो ।
घेउनी दिवट्या हस्ती हर्षे गोंधळ घातला हो ।
कवडी एक अर्पिता देसी हार मुक्ताफळा हो ।
जोगवा मागता प्रसन्न झाली भक्तकुळा हो ॥ ६ ॥
उदो बोला उदो ॥
सप्तमीचे दिवशी सप्तशृंगगडावरी हो ।
तेथे तू नांदसी भोवती पुष्पे नानापरी हो ।
जाईजुई शेवंती पूजा रेखियली बरवी हो ।
भक्त संकटी पडता झेलुनि घेसी वरचेवरी हो ॥ ७ ॥
उदो बोला उदो ॥
अष्टमीचे दिवशी अष्टभुजा नारायणी हो ।
सह्याद्रीपर्वती पाहिली उभी जगज्जननी हो ।
मन माझे मोहिले शरण आलो तुजलागुनी हो ।
स्तनपान देउनी सुखी केले अंतःकरणी हो ॥ ८ ॥
उदो बोला उदो ॥
नवमीचे दिवशी नवदिवसांचे पारणे हो ।
सप्तशतीजप होमहवने सद्भक्ती करुनी हो ।
षड्रस अन्ने नैवेद्यासी अर्पिली भोजनी हो ।
आचार्य ब्राह्मणा तृप्त केले त्वा कृपेकरुनी हो ॥ ९ ॥
उदो बोला उदो ॥
दशमीच्या दिवशी अंबा निघे सीमोल्लंघनी हो ।
सिंहारूढ करी दारुण शस्त्रे अंबे त्वा घेउनी हो ।
शुंभनिशुंभादिक राक्षसा किती मारिसी रणी हो ।
विप्रा रामदासा आश्रय दिधला तो चरणी हो ॥ १० ॥
उदो बोला उदो ॥
नवरात्रि में घटस्थापना से दशहरे तक रोज़ गाई जाने वाली माँ अंबाबाई (तुलजाभवानी / जगदंबा) की मराठी आरती। हर अंतरे में नवरात्रि के एक दिन का वर्णन है; हर अंतरे के बाद "उदो बोला उदो" का जयघोष होता है।
१. (प्रतिपदा) आश्विन शुक्ल पक्ष में अंबा सिंहासन पर विराजीं। प्रतिपदा को घटस्थापना, मूलमंत्र का जप और रक्षक की स्थापना; ब्रह्मा, विष्णु, महेश स्वयं माँ की पूजा करते हैं।
टेक: माँ अंबाबाई का उदो उदो बोलो; सब जयकार से गरजते हैं — उनकी महिमा का वर्णन कैसे करें!
२. (द्वितीया) चौंसठ योगिनियाँ एकत्र होती हैं; उनमें परशुराम की माता श्रेष्ठ हैं। कस्तूरी का तिलक, माँग में सिंदूर भरकर सब चामुंडाएँ जयकार करती हैं।
३. (तृतीया) माँ का शृंगार — तिलक, साड़ी, चोली, गले में मोतियों का हार, पीला पीतांबर; अष्टभुजा माँ अत्यंत सुंदर दिखती हैं।
४. (चतुर्थी) विश्वव्यापी जननी प्रसन्न मन से उपासकों को देखती हैं; पूर्ण कृपा करने वाली जगन्माता के आगे देवता भी दंडवत करते हैं।
५. (पंचमी) उपांगललिता व्रत; अर्घ्य-पाद्य से भवानी की स्तुति, रात को जागरण और हरिकथा, भक्त आनंद में डूबते हैं।
६. (षष्ठी) हाथ में मशालें लेकर गोंधळ (लोक-भक्ति नृत्य) होता है। एक कौड़ी चढ़ाने पर भी माँ मोतियों का हार देती हैं; जोगवा माँगते ही प्रसन्न होती हैं।
७. (सप्तमी) माँ सप्तशृंगी गढ़ पर विराजती हैं; जूही, चमेली, सेवंती के फूलों से पूजा; संकट में पड़े भक्त को वे तुरंत सँभाल लेती हैं।
८. (अष्टमी) सह्याद्रि पर खड़ी अष्टभुजा नारायणी के दर्शन से मन मोहित हुआ; उनकी शरण ली और माँ ने सुखी किया।
९. (नवमी) नौ दिनों का पारण — सप्तशती पाठ, होम-हवन, षड्रस नैवेद्य; आचार्यों-ब्राह्मणों को तृप्त किया।
१०. (दशमी — दशहरा) माँ सिंह पर सवार होकर शस्त्र लेकर सीमोल्लंघन को निकलती हैं, शुंभ-निशुंभ आदि राक्षसों का वध करती हैं; विप्र रामदास को अपने चरणों में आश्रय दिया।