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श्री शंकर जी की आरती

लवथवती विक्राळा — समर्थ रामदास

मूल पाठ

पवित्र पाठ मूल भाषा में ही दिया गया है।

लवथवती विक्राळा ब्रह्मांडी माळा । वीषे कंठ काळा त्रिनेत्री ज्वाळा । लावण्यसुंदर मस्तकी बाळा । तेथुनिया जळ निर्मळ वाहे झुळझुळा ॥ १ ॥ जय देव जय देव जय श्रीशंकरा । आरती ओवाळू तुज कर्पूरगौरा ॥ धृ. ॥ कर्पूरगौरा भोळा नयनी विशाळा । अर्धांगी पार्वती सुमनांच्या माळा । विभूतीचे उधळण शितिकंठ नीळा । ऐसा शंकर शोभे उमावेल्हाळा ॥ २ ॥ जय देव जय देव ॥ देवी दैत्यी सागरमंथन पै केले । त्यामाजी अवचित हलाहल जे उठिले । ते त्वां असुरपणे प्राशन केले । नीलकंठ नाम प्रसिद्ध झाले ॥ ३ ॥ जय देव जय देव ॥ व्याघ्रांबर फणिवरधर सुंदर मदनारी । पंचानन मनमोहन मुनिजनसुखकारी । शतकोटीचे बीज वाचे उच्चारी । रघुकुळटिळक रामदासा अंतरी ॥ ४ ॥ जय देव जय देव ॥

अर्थ

समर्थ रामदास स्वामी की यह आरती श्रावण के सोमवार, महाशिवरात्रि और शिवजी की हर पूजा में गाई जाती है।

१. जिनके गले में ब्रह्मांड (मुंडों) की माला झूलती है, विष से जिनका कंठ काला है और तीसरे नेत्र में ज्वाला है; जिनके मस्तक पर सुंदर गंगा है और वहाँ से निर्मल जल झरझर बहता है — ऐसे शंकर।

धृपद: हे कपूर के समान गौर शंकर, आपकी जय हो; हम आपकी आरती उतारते हैं।

२. वे कपूर-से गौर, भोले और विशाल नेत्रों वाले हैं। आधे अंग में पार्वती हैं, गले में फूलों की मालाएँ हैं, शरीर पर भस्म लगी है और कंठ नीला है — उमा को प्रिय ऐसे शंकर शोभा देते हैं।

३. देवों और दैत्यों ने समुद्र-मंथन किया तो अचानक हलाहल विष निकला। उसे आपने (संसार के लिए) पी लिया, इसलिए आपका नाम नीलकंठ प्रसिद्ध हुआ।

४. बाघंबर पहने, नाग धारण किए, कामदेव का नाश करने वाले, पाँच मुखों वाले, मन मोहने वाले और मुनियों को सुख देने वाले शंकर शतकोटि रामनाम का बीज मुख से जपते हैं। रामदास कहते हैं — रघुकुल के तिलक श्रीराम मेरे अंतर में बसे हैं।

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