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जयदेव जयदेव जयजय श्रीसूर्या

सूर्य की आरती

देवता: श्री सूर्य

मूल पाठ

पवित्र पाठ मूल भाषा में ही दिया गया है।

जयदेव जयदेव जयजय श्रीसूर्या । एकारति ओवाळु सुरगण - प्रभुवर्या ॥धृ॥ द्वादश नामें करुनि करितां तव प्रणती । दोष निवारुनि इच्छित मनोरथ पुरती । अर्ध्यप्रदान करितां पुण्याची प्राप्ती । दर्शनमात्रें साधक भवसागर तरती ॥१॥ ब्राह्मणकुळासि दैवत तुजवांचुनि नाहीं । त्रिकाळ अर्घ्य देती द्विजवर लवलाहीं ॥ प्रथम अहूति अर्पण यज्ञाचे ठायीं । सर्व जगाचि दृष्टी तुजयोगें पाहीं ॥२॥ दशयोजन मोठा रथ निजसारथि अरुण ॥ सप्तमुखाचा अश्व शोभतसे वहन । अठ्यायशीसहस्त्र ऋषि करिति स्तवन । निरंजन प्रार्थितसे करुनिया नमन ॥३॥

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