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जय देव जय देव जय अवधूता

देवता: श्री दत्त

मूल पाठ

पवित्र पाठ मूल भाषा में ही दिया गया है।

जय देव जय देव जय अवधूता । अगम्यें लीला स्वामी त्रिभुवनि तुझि सत्ता ॥ धृ. ॥ तुझें दर्शन होतां जाती हीं पापें । स्पर्शनमात्रें विलया जाती भवदुरितें ॥ चरणी मस्तक ठेवुनि मनिं समजा पुरतें । वैकुंठीचे सुख नाही यापरतें ॥ जय. ॥ १ ॥ सुगंधकेशर भाळीं वर टोपीटीळा कर्णि कुंडलें शोभति वक्ष:स्थळि माळ । शरणांगत तुज होतां भय पडलें काळा । तुझे दास करिती सेवासोहळा ॥ २ ॥ मानवरुपी काया दिससी आम्हांस । अक्कलकोटी केंला यतिवेषे वास ॥ पूर्णब्रह्म तोची अवतरला खास । अज्ञानी जीवांस विपरीत हा भास ॥ जय. ॥ ३ ॥ निर्गुण निर्विकार विश्वव्यापक । स्थिरचर व्यापुनि अवघा उरलासी एक ॥ अनंत रुपें धरिसी करणें मायीक । तुझें गुण वर्णिता थकले विधिलेख ॥ ४ ॥ घडता अनंतजन्यसुकृत हें गांठी त्याची ही फलप्राप्ती सद्‌गुरुची भेटी । सुवर्णताटी भरलीं अमृतरसवाटी ॥ शरणागत दासावरि करी कृपादृष्टी ॥ ५ ॥

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