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आरती सप्रेम

दशावतार की आरती

देवता: श्री विठ्ठल

मूल पाठ

पवित्र पाठ मूल भाषा में ही दिया गया है।

आरती सप्रेम जय जय विठ्ठल परब्रह्म । भक्तसंकटी नानास्वरूपीं स्थापिसी स्वधर्म ॥ धृ. ॥ अंवऋषी कारणे गर्भवास सोशीसी । वेद नेले चोरुनि ब्रह्मा आणुनिया देसी । मत्स्यरुपीं नारायण सप्तहि सागर धुंडीसी । हस्त लागतां शंखासुरा तुझा वर देसी ॥ १ ॥ रसा तळाशी जातां पृथ्वी पाठीवर घेसी ।परोपकारासाठी देवा कांसव झालासी ॥ दाढें धरुनी पृथ्वी नेता वराहरुप होसी । प्रल्हादा कारणे स्तंभी नरहरि गुरगुरसी ॥ २ ॥ पांचवे अवतारी बळिच्या द्वाराला जासी । भिक्षे स्थळ मागुनी बळिला पाताळी नेसी ॥ सर्व समर्पण केले म्हणउनि प्रसन्न त्या होसी । वामनरूप धरूनी बळिच्याद्वारी तिष्ठसी ॥ ३ ॥ सगस्त्रार्जुन मातला जमंदग्नीचा वध केला । कष्टी ते रेणुका म्हणुनी सहस्रार्जुन वधिला ॥ नि:क्षत्री पृथ्वी दान दिधली विप्राला । सहावा अवतार परशुराम प्रगटला ॥ ४ ॥ मातला रावण सर्वा उपद्रव केला । तेहतिस कोटी देव बंदी हरलें सीतेला ॥ पितृवचना लागीं रामें वनवास केला । मिळोनी वानर सहित राजाराम प्रगटला ॥ ५ ॥ देवकी वसुदेव बंदी मोचन त्वां केलें । नंदाघरि जाऊन निजसुख गोकुळा दिधले ॥ गोरसचोरी करिता नवलक्ष गोपाळ मिळविले । गोपिकांचे प्रेम देखुनि श्रीकृष्ण भुलले ॥ ६ ॥ बौद्ध कलंकी कवियुगी झाला अधर्म हा अवघा । सांडुनि नित्यधर्म सोडुनि नंदाची सेवा ॥ म्लेंच्छमर्दन करिसी म्हणुनी कलंकी केशवा । बहिरवि जान्हवि द्याचि निजसुखा नंदसेवा ॥ ७ ॥

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